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ऐतिहासिक स्मारक

ऐतिहासिक स्मारक जल महल शहर के दक्षिण मे आबादी से बाहर स्थित है। इसका निमार्ण 1591 में नारनौल के जागीरदार शाह कुली खान ने करवाया था। इतिहास प्रसिद्ध पानीपत के द्वितीय युद्ध में शाह कुली खान ने हेमू को पकड़ा था। उसी उपलब्धी में अकबर ने खुश होकर शाह कुली खान को नारनौल की जागीर सौंपी थी। जलमहल का निमार्ण लगभग 11 एकड के विशाल भूखण्ड पर किया गया हैं। यह विशाल तालाब के बीच में स्थित हैलेकिन स्मारक तक पहुचने के लिए पुल बना हुआ है। विशाल तालाब के बीच एक छोटे महल के आकार के इस सुन्दर भवन के निमार्ण में चूने व पत्थर का प्रयोग किया गया है। लगभग 400 वर्ष के अन्तराल में यह तालाब मिटटी से भर गया था। सन्‌ 1993 में जिला प्रशासन ने जलमहल के तालाब से मिट्‌टी निकालने का कार्य आरम्भ किया और अब  इसकी मिट्‌टी निकाली जा चुकी है।


नारनौल की सघन आबादी के बीच इस ऐतिहासिक स्मारक का निमार्ण शाहजंहा के शासन काल में नारनौल के दिवान राय मुकन्द दास ने करवाया था। यह स्मारक नारनौल के मुगलकालीन ऐतिहासिक स्मारको में सबसे बड़ा है। भवन के भीतर से पानी की निकासी, फव्वारों की व्यवस्था तथा भूमिगत मंजिल में प्रकाश व पानी की निकासी व्यवस्था देखने योग्य है। इस पांच मंजिल के भवन का आकार चौकोर है जिसके बीच में बड़ा चौक है। भवन के विशाल शिलाओं वाले स्तम्भ, दरबार हाल तथा विशाल बरामदे और सीढियां व छत्तरियां भवन निमार्ण कला का अनूठा नमूना है। यद्यपि, इस समय अधिकांश छत्ता छतिग्रस्त हो चुका है और स्मारक जीर्णावस्था में है। बताया जाता है कि यह स्मारक सुरंग मार्ग से दिल्ली, जयपुर, महेन्द्रगढ तथा ढ़ोसी से जुड़ा हुआ है। जनश्रुति के अनुसार बहुत समय पहले एक बारात सुरंग देखने के लिए अन्दर घुसी थी परन्तु वह लौटकर नही आई। अकबर के शासनकाल में यहा बीरबल का आना जाना था


नारनौल शहर के दक्षिण में घनी आबादी के बीच स्थित इब्राहिम खान का मकबरा एक विशाल गुम्बद के आकार का है। इसका निमार्ण इतिहास प्रसिद्ध सम्राट शेरशाह सूरी ने अपने दादा इब्राहिम खान की यादगार में करवाया था। लोधी शासनकाल में इब्राहिम खान नारनौल के जागीरदार रहे थे। मकबरे के अन्दर इब्राहिम खान की कब्र है, जिस पर खानदान का निशान भी अंकित है। इसके पास दो छोटी कब्रे भी हैं। इब्राहिम खान के मकबरे के निमार्ण में लाल स्लेटी रंग के पत्थर का प्रयोग किया गया हैं, जिस पर मीनाकारी का कार्य बड़ी दक्षता से किया गया हैं। बड़ी-बड़ी शिलाओ वाला पत्थर इतना साफ और चिकना है कि अक्समात्उसे देखकर संगमरमर होने का भ्रम होता हैं। यह स्मारक नारनौल के ऐतिहासिक स्मारको में सबसे अच्छी स्थिति में हैं।

शहर की उत्तरी पश्चिमी दिशा में एक ऊंचाई वाले स्थान पर निर्मित ऐतिहासिक स्मारक चोर गुम्बद का निमार्ण जमाल खान नामक एक अफगान शासक ने अपनी ही समाधि-स्थल के रूप में करवाया था। यद्यपि यह यादगार के रूप में बनवाया गया था, परन्तु शहर के बाहर स्थित होने के कारण इस स्थल पर चोर उचक्के शरण लेने लगे थे, जिसके फल स्वरूप इसका नाम कालान्तर में चोर गुम्बद पड़ गया। यह एक विशाल गोलाकार गुम्बद है जिसकी छत को गोलाकार देकर बहुत उंचाई तक उठाया गया है। देखने में यह दो मंजिला लगता है, लेकिन इसकी उपरी मंजिल केवल बरामदा मात्र है जिसके 20 द्वार हैं। स्मारक की पश्चिमा दिशा को छोड कर शेष तीनों दिशाओं में एक-एक द्वार हैं।


नारनौल शहर को बावड़ियों तालाबों का शहर कहा जाता हैं। यद्यपि शहर की बहुत प्राचीन बावडियों का अस्तित्व अब नही रहा हैं, परन्तु मिर्जा अली जां की बावड़ी आज भी विद्यमान है। यह नारनौल शहर के पश्चिम में आबादी से बाहर स्थित है। इस ऐतिहासिक बावड़ी का निमार्ण मिर्जा अली जां ने करवाया था। इसके निमार्ण के समय की सही जानाकारी नही मिलती। इस बावड़ी पर संगमरमर का एक बड़ा तखत रखा है, जिसके कारण इसे तखतवाली बावड़ी के नाम से भी जाना जाता है। बावड़ी के पास ही एक कुआं है। बावड़ी में फव्वारा तथा नालियों द्वारा पानी पहुचाने की प्राचीन व्यवस्था देखने योग्य हैं। बावड़ी जीर्णावस्था में है। जिला प्रशासन ने इस बावड़ी की आंशिक मरम्मत का कार्य भी सम्पन्न करवाया है।

महेन्द्रगढ़ से 15 किमी. दूर सतनाली सडक मार्ग पर अरावली पर्वत श्रृंखला की पहाडियो के बीच सबसे ऊंची चोटी पर एक किला स्थित है। यह माधोगढ का ऐतिहासिक किला है। पर्वत की तलहटी में माधोगढ गावं बसा है। यद्यपि इस किले के निमार्ण के सम्बन्ध में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नही है, परन्तु ऐसा माना जाता है कि इसका निमार्ण राजस्थान के सवाईमाधोपुर के शासक माधोसिंह ने करवाया था। इस समय यह किला अत्यन्त जीर्णावस्था में है। सम्भवतः किले के साथ पहाड के चारों और 52 बुर्जियां थी, जिनके कुछ अवशेष आज भी देखो जा सकते हैं। लगभग 800 वर्ग गज के क्षेत्र में फैले इस किले में 30 कोठरियां बनी हुई हैं। मुख्य किले से कुछ नीचे एक अन्य भवन है, जिसमें 12 कोठरियां हैं। गांव के लोग इसे रानी का महल के नाम से जानते हैं। किले से लगभग 150 मीटर नीचे एक तालाब है। इसी तालाब से किले में पानी की आवश्यकता की पूर्ति होती थी। ऐसी मान्यता है कि कालान्तर में इस किले का प्रयोग चोर ड़ाकुओं द्वारा किया जाता रहा हैं। इस वक्त यह स्थान एक खण्डहर ही प्रतीत होता हैं।


शाह विलायत का मकबरा इब्राहिम खान के मकबरे के एक ओर है यह मकबरा आकार में बड़ा है और एक महाविद्यालय जैसा लगता है जिसमें तुगलक से लेकर ब्रिटिश काल तक की परम्परागत वास्तुकला को सजाया गया है इसकी मौलिकता बाद में हुए निमार्ण कार्यों के कारण पूरी तरह नहीं रखी जा सकी है फिरोज शाह तुगलक के काल में यह मकबरा और इसके निकट के स्थल बनाए गए थे गुलजार के लेखक कहते है कि आलम खान मेवाड़ी ने इसका पूर्वी बरामदा और गुम्बद बनवाए और इसके निकट का भाग भी उन्होंने तैयार किया इस मकबरे के पुराने भाग को देखकर हर कोई तुगलकिया वास्तुशिल्प की सराहना किए बिना नहीं रह सकता तत्कालीन रीति-रिवाजों के अनुसार यहां मेहराबों का वक्राकार निमार्ण करवाया गया था गोलार्घीय गुम्बद के कारण मकबरा स्वयं ही ऊपर हो गया है गुम्बद का आन्तरिक भाग बिल्कुल चौरस है और इसमें कुछ चित्रकारी हुई है जो काफी देर बाद की है इसकी दो चारदीवारियां मुगलकाल से ही थी, जबकि एक हिस्सा ब्रिटिश काल में बनाया गया